'राम की शक्तिपूजा' में केन्द्रीय संवेदना 'सीता की मुक्ति'
DOI:
https://doi.org/10.84761/9qa7wq73Abstract
छायावाद के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि महाप्राण निराला द्वारा 1936 ई. में रचित ‘राम की शक्तिपूजा’ एक लंबी प्रबंधात्मक कविता है। यह कविता स्वतंत्रता संग्राम के दौर में लिखी गई भारतीयों के लिए सबसे अधिक प्ररेणा का स्रोत रही। उस दौर में स्त्रियों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की, परन्तु स्वंय की स्थिति से उभर नहीं पाई थी। ‘राम की शक्तिपूजा’ के माध्यम से स्त्रियो को घर की चारदीवारी से बाहर लाने का काम निराला जी ने किया है जिसके बाद उन्होंने समाज में अपनी पहचान कायम की। इस कविता का केन्द्रीय भाव सीता की मुक्ति और सीता के प्रतीक के माध्यम से नारी मुक्ति की कामना की है। निराला गार्हस्थिक प्रेम के कवि हैं उनके सम्पूर्ण साहित्य में गार्हस्थिक प्रेम के प्रति समर्पण के कई उदाहरण दिखते हैं। जैसे पंचवटी प्रसंग में तुलसीदास तथा सरोज-स्मृति के भी कुछ अंश है। शक्तिपूजा की मूल संवेदना इसी कड़ी का अगला चरण है। वे सरोज-स्मृति में पुत्री की मुक्ति करते हैं। ‘राम की शक्तिपूजा’ में पत्नी की मुक्ति उनकी नारी मुक्ति चेतना का सर्वोच्च चरण है जिस अधर्मी व आसुरी शक्ति का स्त्रियों को सामना करना पड़ता है। राम की शक्तिपूजा में सीता की मुक्ति का केन्द्रीय भाव है। इसका प्रमाण यह है कि सिर्फ कथानक के उद्देश्य के रूप में नहीं बल्कि हर मोड़ पर सीता उपस्थित हैं। यूं प्रतीत होता है कि राम के पास न होते हुए भी राम के शिविर की सभी घटनाओं का संचालन सीता ही कर रही हैं।




